या मन गहि जो थिर रहै, गहरी धूनी गाड़ि।
चलती बिरयाँ उठि चला, हस्ती घोड़ा छाड़ि॥
इस मन को पकड़कर स्थिर हो जाओ और गहरी धूनी जमा लो। चलने का समय आते ही हाथी-घोड़े छोड़कर उठ चलना पड़ेगा।
मन और संयम
इस मन को पकड़कर स्थिर हो जाओ और गहरी धूनी जमा लो। चलने का समय आते ही हाथी-घोड़े छोड़कर उठ चलना पड़ेगा।
मन और संयम
आया था किस काम को, तू सोया चादर तान।
सुरत सम्भाल ए गाफिल, अपना आप पहचान॥
तू इस संसार में किस काम के लिए आया था, और चादर तानकर बेसुध सो रहा है! हे लापरवाह मनुष्य, अपनी सुध सँभाल और अपने असली स्वरूप को पहचान।
मन और संयमबाजीगर का बाँदरा, ऐसा जीव मन के साथ।
नाना नाच दिखाय कर, राखे अपने साथ॥
जीव मन के हाथों वैसे ही नचाया जाता है जैसे मदारी अपने बंदर को नचाता है। मन तरह-तरह के नाच दिखाकर जीव को अपने वश में बनाए रखता है। मन को साधना ही साधना है।
मन और संयमअटकी भाल शरीर में, तीर रहा है टूट।
चुम्बक बिना निकले नहीं, कोटि पटन को फूट॥
शरीर में तीर की नोक अटकी रह गई है और तीर टूट चुका है। यह चुम्बक के बिना नहीं निकलेगी, चाहे करोड़ों उपाय कर लो। इसी तरह मन में धँसा विकार गुरु-कृपा रूपी चुम्बक से ही निकलता है।
मन और संयममैं अपराधी जन्म का, नख-सिख भरा विकार।
तुम दाता दुःख भंजना, मेरी करो सम्हार॥
मैं जन्म से ही अपराधी हूँ और नख से शिखा तक विकारों से भरा हूँ। तुम दाता हो और दुःखों को हरने वाले हो—मेरी सँभाल करो। यह विनम्र आत्म-स्वीकृति है।
मन और संयम