कामी अभी न भावई, विष ही कों ले सोधि।
कुबुद्धि न जीव की, भावै स्यंभ रहौ प्रमोथि॥
कामी व्यक्ति को अमृत नहीं भाता, वह विष को ही खोजकर ले लेता है। जीव की कुबुद्धि जाती नहीं, चाहे कितना ही समझाया-मथा जाए।
मन और संयम