कबीरा राम रिझाइ लै, मुखि अमृत गुण गाइ।
फूटा नग ज्यूँ जोड़ि मन, संधे संधि मिलाइ॥
मुख से अमृत जैसे गुण गाकर राम को प्रसन्न कर लो। जैसे टूटे रत्न को जोड़ते समय संधि से संधि मिलाई जाती है, वैसे ही बिखरे मन को सावधानी से जोड़ना पड़ता है।
मन और संयम