नर नारायन रूप है, तू मति समझे देह।
जो समझै तो समझ ले, खलक पलक में खोह॥
मनुष्य नारायण का ही रूप है, उसे केवल देह मत समझ। समझना हो तो अभी समझ ले—यह संसार पल भर में मिट जाता है।
काल और मृत्यु
मनुष्य नारायण का ही रूप है, उसे केवल देह मत समझ। समझना हो तो अभी समझ ले—यह संसार पल भर में मिट जाता है।
काल और मृत्यु
रात गँवाई सोय के, दिवस गँवाया खाय।
हीरा जन्म अनमोल था, कौड़ी बदले जाय॥
रात सोने में और दिन खाने-पीने में बीत गया। यह मनुष्य-जन्म हीरे के समान अनमोल था, पर कौड़ियों के मोल गँवा दिया गया। जीवन का उद्देश्य भोग नहीं, आत्म-कल्याण है।
काल और मृत्युदुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारंबार।
तरुवर ज्यों पत्ती झड़े, बहुरि न लागे डार॥
मनुष्य-जन्म अत्यंत दुर्लभ है, यह देह बार-बार नहीं मिलती। जैसे वृक्ष से गिरा पत्ता फिर उसी डाली पर नहीं लगता, वैसे ही बीता जीवन लौटकर नहीं आता।
काल और मृत्युमाँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख।
माँगन से तो मरना भला, यह सतगुरु की सीख॥
माँगना मृत्यु के समान है—किसी से भीख मत माँगो। सतगुरु की शिक्षा यही है कि हाथ फैलाने से मर जाना बेहतर है। स्वाभिमान और परिश्रम से जीना ही मनुष्य की शोभा है।
काल और मृत्युदस द्वारे का पिंजरा, तामें पंछी का कौन।
रहे को अचरज है, गए अचंभा कौन॥
यह शरीर दस द्वारों वाला पिंजरा है, इसमें रहने वाला जीव-पक्षी किसी का अपना नहीं। आश्चर्य तो इसका ठहरे रहने पर है; उड़ जाने पर अचरज कैसा? मृत्यु स्वाभाविक है, जीवन ही विस्मय है।
काल और मृत्यु