चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोय।
दुइ पट भीतर आइके, साबित बचा न कोय॥
चलती चक्की देखकर कबीर रो पड़े—दो पाटों के बीच आकर कोई साबुत नहीं बचा। इसी तरह काल के दो पाटों के बीच पिसकर कोई भी बचा नहीं रह पाता।
काल और मृत्यु