जा पल दरसन साधु का, ता पल की बलिहारी।
राम नाम रसना बसे, लीजै जनम सुधारि॥
जिस क्षण साधु के दर्शन हों, वह क्षण धन्य है। उस संग से जीभ पर राम-नाम बस जाता है और जन्म सुधर जाता है।
भक्ति और नाम-स्मरण
जिस क्षण साधु के दर्शन हों, वह क्षण धन्य है। उस संग से जीभ पर राम-नाम बस जाता है और जन्म सुधर जाता है।
भक्ति और नाम-स्मरण
दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, दुख काहे को होय॥
दुःख पड़ने पर हर कोई ईश्वर को याद करता है, पर सुख के दिनों में कोई नहीं। कबीर कहते हैं—यदि मनुष्य सुख के समय भी प्रभु का स्मरण करता रहे, तो उसके जीवन में दुःख आने का अवसर ही न आए।
भक्ति और नाम-स्मरणसुख में सुमिरन ना किया, दुःख में किया याद।
कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद॥
जिसने सुख के दिनों में कभी ईश्वर को याद न किया और केवल दुःख आने पर पुकारा, कबीर कहते हैं—उस स्वार्थी भक्त की पुकार भला कौन सुनेगा? भक्ति निरंतर होनी चाहिए, आवश्यकता पड़ने पर नहीं।
भक्ति और नाम-स्मरणलूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट।
पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट॥
राम-नाम का यह अनमोल खजाना खुला पड़ा है—जितना लूट सको लूट लो। जब प्राण देह छोड़ देंगे, तब पछताने से कुछ हाथ न आएगा। भजन का अवसर जीवित रहते ही है।
भक्ति और नाम-स्मरणपाँच पहर धंधे गया, तीन पहर गया सोय।
एक पहर हरि नाम बिन, मुक्ति कैसे होय॥
दिन के पाँच पहर कामकाज में और तीन पहर नींद में बीत गए। जब एक पहर भी हरि-नाम के लिए नहीं निकाला, तो मुक्ति कैसे मिलेगी? समय का यह विभाजन ही जीवन की दिशा तय करता है।
भक्ति और नाम-स्मरण