जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जान समान।
जैसे खाल लुहार की, साँस लेत बिन प्रान॥
जिस हृदय में प्रेम का संचार नहीं, उसे श्मशान के समान समझो। वह लोहार की धौंकनी की तरह है—साँस तो लेती है, पर उसमें प्राण नहीं होते।
प्रेम और विरह