कबीर पगरा दूर है, बीच पड़ी है रात।
न जानों क्या होयेगा, ऊगंता परभात॥

अर्थ

मंजिल दूर है और बीच में रात पड़ी है। पता नहीं प्रभात होते-होते क्या हो जाए।

काल और मृत्यु

काल और मृत्यु पर और दोहे

019

रात गँवाई सोय के, दिवस गँवाया खाय।
हीरा जन्म अनमोल था, कौड़ी बदले जाय॥

रात सोने में और दिन खाने-पीने में बीत गया। यह मनुष्य-जन्म हीरे के समान अनमोल था, पर कौड़ियों के मोल गँवा दिया गया। जीवन का उद्देश्य भोग नहीं, आत्म-कल्याण है।

काल और मृत्यु
022

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारंबार।
तरुवर ज्यों पत्ती झड़े, बहुरि न लागे डार॥

मनुष्य-जन्म अत्यंत दुर्लभ है, यह देह बार-बार नहीं मिलती। जैसे वृक्ष से गिरा पत्ता फिर उसी डाली पर नहीं लगता, वैसे ही बीता जीवन लौटकर नहीं आता।

काल और मृत्यु
025

माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख।
माँगन से तो मरना भला, यह सतगुरु की सीख॥

माँगना मृत्यु के समान है—किसी से भीख मत माँगो। सतगुरु की शिक्षा यही है कि हाथ फैलाने से मर जाना बेहतर है। स्वाभिमान और परिश्रम से जीना ही मनुष्य की शोभा है।

काल और मृत्यु
033

दस द्वारे का पिंजरा, तामें पंछी का कौन।
रहे को अचरज है, गए अचंभा कौन॥

यह शरीर दस द्वारों वाला पिंजरा है, इसमें रहने वाला जीव-पक्षी किसी का अपना नहीं। आश्चर्य तो इसका ठहरे रहने पर है; उड़ जाने पर अचरज कैसा? मृत्यु स्वाभाविक है, जीवन ही विस्मय है।

काल और मृत्यु