कबीर जंत्र न बाजई, टूटि गये सब तार।
जंत्र बिचारा क्याय करे, गया बजावन हार॥
यह वाद्य अब बजता नहीं, इसके सारे तार टूट गए। बेचारा वाद्य क्या करे—बजाने वाला ही चला गया। देह वैसी ही है जब प्राण निकल जाएँ।
काल और मृत्यु