माँगन गै सो भर रहै, भरे जु माँगन जाहिं।
तिन ते पहिले वे मरे, होत करत है नाहिं॥
जो माँगने गया वह भरा नहीं और जो भरे थे वे भी माँगने चले गए। ऐसे लोग जीते-जी ही मरे हुए हैं—उनसे कुछ बनता-होता नहीं।
संतोष और त्याग