साधु गाँठि न बाँधई, उदर समाता लेय।
आगे-पीछे हरि खड़े, जब भोगे तब देय॥
साधु कल के लिए गाँठ नहीं बाँधता, केवल पेट भर लेता है। आगे-पीछे स्वयं हरि खड़े हैं—जब आवश्यकता होगी तब वे स्वयं दे देंगे। संग्रह अविश्वास का चिह्न है।
संतोष और त्याग