खूब खाँड है खीचड़ी, माहि पड्याँ टुक लून।
देख पराई चूपड़ी, जी ललचावे कौन॥
थोड़ा-सा नमक पड़ी खिचड़ी भी शक्कर जैसी मीठी है। फिर पराई चुपड़ी रोटी देखकर मन क्यों ललचाए? अपने में संतोष हो तो दूसरे का वैभव नहीं खलता।
संतोष और त्याग