माँगन-मरण समान है, तोहि दई मैं सीख।
कहें कबीर समझाय के, मति कोई माँगे भीख॥
माँगना मरने के समान है—यही सीख मैं तुम्हें देता हूँ। कबीर समझाकर कहते हैं, कोई भीख मत माँगे।
संतोष और त्याग
माँगना मरने के समान है—यही सीख मैं तुम्हें देता हूँ। कबीर समझाकर कहते हैं, कोई भीख मत माँगे।
संतोष और त्याग
साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय॥
हे प्रभु! मुझे इतना ही दीजिए जिसमें मेरा परिवार भरण-पोषण पा सके—न मैं भूखा रहूँ और न मेरे द्वार से कोई साधु भूखा लौटे। यह संतोष और सादगी की प्रार्थना है, धन-संचय की नहीं।
संतोष और त्यागआए हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर।
एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बँधे जात जंजीर॥
जो इस संसार में आया है वह जाएगा ही—चाहे राजा हो, गरीब हो या फकीर। कोई सिंहासन पर सवार होकर विदा होता है, कोई जंजीरों में बँधकर; पर जाना सबको है।
संतोष और त्यागसाधु गाँठि न बाँधई, उदर समाता लेय।
आगे-पीछे हरि खड़े, जब भोगे तब देय॥
साधु कल के लिए गाँठ नहीं बाँधता, केवल पेट भर लेता है। आगे-पीछे स्वयं हरि खड़े हैं—जब आवश्यकता होगी तब वे स्वयं दे देंगे। संग्रह अविश्वास का चिह्न है।
संतोष और त्यागजो तू चाहे मुक्ति को, छोड़े दे सब आस।
मुक्त ही जैसा हो रहे, बस कुछ तेरे पास॥
यदि तू मुक्ति चाहता है तो सारी आशाएँ छोड़ दे। जब तू मुक्त जैसा हो जाएगा, तब सब कुछ अपने आप तेरे पास होगा। इच्छाओं का त्याग ही मुक्ति का द्वार है।
संतोष और त्याग