अनमाँगा तो अति भला, माँगि लिया नहिं दोष।
उदर समाता माँगि ले, निश्चय पावै योष॥
बिना माँगे मिलना अत्यंत उत्तम है, और पेट भर के लिए माँग लेने में भी दोष नहीं। उतने से ही संतोष निश्चित मिल जाता है।
संतोष और त्याग