साधु कहावन कठिन है, ज्यों खाँड़े की धार।
डगमगाय तो गिर पड़े, निहचल उतरे पार॥
साधु कहलाना तलवार की धार पर चलने जैसा कठिन है। जो डगमगाया वह गिर पड़ा, और जो अडिग रहा वही पार उतरा।
साधु के लक्षण
साधु कहलाना तलवार की धार पर चलने जैसा कठिन है। जो डगमगाया वह गिर पड़ा, और जो अडिग रहा वही पार उतरा।
साधु के लक्षण
शीलवंत सबसे बड़ा, सब रतनन की खान।
तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन॥
शीलवान अर्थात् सदाचारी व्यक्ति सबसे बड़ा है—वह सभी रत्नों की खान है। तीनों लोकों की समस्त सम्पदा शील में ही समाई हुई है। चरित्र से बड़ी कोई पूँजी नहीं।
साधु के लक्षणहद चाले सो मानव, बेहद चले सो साध।
हद बेहद दोनों तजे, ताको भता अगाध॥
जो सीमाओं के भीतर चलता है वह साधारण मनुष्य है, जो सीमा से परे चला जाए वह साधु है। पर जो सीमा और असीम—दोनों को छोड़ दे, उसकी अवस्था अथाह और अवर्णनीय है।
साधु के लक्षणसाधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहे, थोथा देइ उड़ाय॥
साधु का स्वभाव सूप जैसा होना चाहिए—जो सार्थक है उसे रख ले और थोथे को उड़ा दे। विवेक यही है कि गुण ग्रहण करो और निस्सार को छोड़ दो।
साधु के लक्षणछीर रूप सतनाम है, नीर रूप व्यवहार।
हंस रूप कोई साधु है, सत का छाननहार॥
सत्यनाम दूध के समान है और सांसारिक व्यवहार पानी के समान। कोई विरला साधु ही हंस के समान होता है, जो दूध और पानी अलग करके सत्य को छान लेता है।
साधु के लक्षण