ब्राह्मण गुरु जगत् का, साधू का गुरु नाहिं।
उरझि-पुरझि करि भरि रह्या, चारिउं बेदा माहिं॥
ब्राह्मण संसार का गुरु भले हो, साधु का गुरु नहीं हो सकता—क्योंकि वह चारों वेदों के शब्दजाल में ही उलझा रह गया, अनुभव तक नहीं पहुँचा।
साधु के लक्षण