साँझ पड़े दिन बीतबै, चकवी दीन्ही रोय।
चल चकवा वा देश को, जहाँ रैन नहिं होय॥
साँझ होते ही दिन बीत गया और चकवी विरह में रो पड़ी। वह कहती है—हे चकवा, चलो उस देश को जहाँ रात होती ही नहीं। जीव उस अखंड प्रकाश के लोक को तरसता है।
प्रेम और विरह