गोव्यंद के गुण बहुत हैं, लिखै जु हिरदै माहिं।
डरता पाणी जा पीऊँ, मति वै धोये जाहिं॥
गोविंद के अनेक गुण हृदय पर लिखे हैं। मैं पानी पीने भी डरते हुए जाता हूँ कि कहीं वे धुल न जाएँ। यह प्रेम की अत्यंत कोमल अभिव्यक्ति है।
प्रेम और विरह