परबति परबति मैं फिरया, नैन गंवाए रोइ।
सो बूटी पाऊँ नहीं, जा ते जीवनि होइ॥
पर्वत-पर्वत भटकता फिरा और रो-रोकर आँखें गँवा दीं, पर वह संजीवनी बूटी नहीं मिली जिससे जीवन मिलता है। बाहर खोजने से वह तत्त्व नहीं मिलता।
प्रेम और विरह