ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाहिं।
सीस उतारे भुइँ धरे, तब बैठें घर माँहि॥
यह प्रेम का घर है, मौसी का घर नहीं कि सहज ही चले आओ। यहाँ तो सिर उतारकर भूमि पर रखना पड़ता है, तभी भीतर बैठने को मिलता है। प्रेम पूर्ण समर्पण माँगता है।
प्रेम और विरह