ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाहिं।
सीस उतारे भुइँ धरे, तब बैठें घर माँहि॥

अर्थ

यह प्रेम का घर है, मौसी का घर नहीं कि सहज ही चले आओ। यहाँ तो सिर उतारकर भूमि पर रखना पड़ता है, तभी भीतर बैठने को मिलता है। प्रेम पूर्ण समर्पण माँगता है।

प्रेम और विरह

प्रेम और विरह पर और दोहे

038

मैं रोऊँ जब जगत को, मोको रोवे न कोय।
मोको रोवे सोई जन, जो शब्द बोध का होय॥

मैं संसार की दशा देखकर रोता हूँ, पर मेरे लिए कोई नहीं रोता। मेरे लिए वही रोएगा जिसे शब्द और ज्ञान का बोध होगा। सच्ची पीड़ा को केवल ज्ञानी ही पहचानता है।

प्रेम और विरह
059

लगी लगन छूटे नाहिं, जीभ चोंच जरि जाय।
मीठा कहा अंगार में, जाहि चकोर चबाय॥

एक बार सच्ची लगन लग जाए तो वह छूटती नहीं, चाहे जीभ और चोंच जल जाए। अंगारे में कौन-सी मिठास है जो चकोर उसे चबाता है? प्रेम तर्क से परे है।

प्रेम और विरह
064

प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा-प्रजा जोहि रुचे, शीश देई ले जाय॥

प्रेम न किसी बगीचे में उगता है और न बाजार में बिकता है। राजा हो या प्रजा—जिसे चाहिए, वह अपना शीश देकर ही ले जा सकता है। प्रेम का मूल्य समर्पण है।

प्रेम और विरह
065

प्रेम प्याला जो पिये, शीश दक्षिणा देय।
लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय॥

जो प्रेम का प्याला पीता है, वह अपना सिर दक्षिणा में दे देता है। लोभी व्यक्ति सिर नहीं दे सकता, वह केवल प्रेम का नाम भर लेता है। कथनी और करनी का यही अंतर है।

प्रेम और विरह