जो रोऊँ तो बल घटै, हँसों तो राम रिसाइ।
मन ही माँहि बिसूरणा, ज्यूँ घुँण काठहि खाइ॥
रोऊँ तो शक्ति क्षीण होती है और हँसूँ तो राम अप्रसन्न होते हैं। इसलिए मन ही मन घुटता रहता हूँ, जैसे घुन भीतर ही भीतर लकड़ी को खा जाता है।
प्रेम और विरह