कबीर हँसणाँ दूरि करि, करि रोवण सौ चित्त।
बिन रोयां क्यूँ पाइये, प्रेम पियारा मित्त॥
हँसी-ठिठोली छोड़ो और मन को रोने की ओर लगाओ। बिना विरह में रोए वह प्रेम का प्यारा मित्र कैसे मिलेगा? आँसू भक्ति की सच्ची कसौटी हैं।
प्रेम और विरह