सब रग तंत रबाब तन, बिरह बजावै नित्त।
और न कोई सुणि सकै, कै साईं के चित्त॥
यह शरीर रबाब है और सारी नसें उसके तार—विरह उन्हें नित्य बजाता रहता है। इस संगीत को और कोई नहीं सुन सकता, केवल स्वामी का मन ही सुनता है।
प्रेम और विरह