अंषड़ियाँ झाईं पड़ी, पंथ निहारि-निहारि।
जीभड़ियाँ छाला पड़्या, राम पुकारि-पुकारि॥

अर्थ

राह देखते-देखते आँखों में झाइयाँ पड़ गईं और राम-राम पुकारते-पुकारते जीभ पर छाले पड़ गए। प्रतीक्षा की यह पीड़ा भक्त के समर्पण की गहराई बताती है।

भक्ति और नाम-स्मरण

भक्ति और नाम-स्मरण पर और दोहे

001

दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, दुख काहे को होय॥

दुःख पड़ने पर हर कोई ईश्वर को याद करता है, पर सुख के दिनों में कोई नहीं। कबीर कहते हैं—यदि मनुष्य सुख के समय भी प्रभु का स्मरण करता रहे, तो उसके जीवन में दुःख आने का अवसर ही न आए।

भक्ति और नाम-स्मरण
007

सुख में सुमिरन ना किया, दुःख में किया याद।
कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद॥

जिसने सुख के दिनों में कभी ईश्वर को याद न किया और केवल दुःख आने पर पुकारा, कबीर कहते हैं—उस स्वार्थी भक्त की पुकार भला कौन सुनेगा? भक्ति निरंतर होनी चाहिए, आवश्यकता पड़ने पर नहीं।

भक्ति और नाम-स्मरण
009

लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट।
पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट॥

राम-नाम का यह अनमोल खजाना खुला पड़ा है—जितना लूट सको लूट लो। जब प्राण देह छोड़ देंगे, तब पछताने से कुछ हाथ न आएगा। भजन का अवसर जीवित रहते ही है।

भक्ति और नाम-स्मरण
014

पाँच पहर धंधे गया, तीन पहर गया सोय।
एक पहर हरि नाम बिन, मुक्ति कैसे होय॥

दिन के पाँच पहर कामकाज में और तीन पहर नींद में बीत गए। जब एक पहर भी हरि-नाम के लिए नहीं निकाला, तो मुक्ति कैसे मिलेगी? समय का यह विभाजन ही जीवन की दिशा तय करता है।

भक्ति और नाम-स्मरण