अंषड़ियाँ झाईं पड़ी, पंथ निहारि-निहारि।
जीभड़ियाँ छाला पड़्या, राम पुकारि-पुकारि॥
राह देखते-देखते आँखों में झाइयाँ पड़ गईं और राम-राम पुकारते-पुकारते जीभ पर छाले पड़ गए। प्रतीक्षा की यह पीड़ा भक्त के समर्पण की गहराई बताती है।
भक्ति और नाम-स्मरण