जा कारणि मैं ढूँढ़ती, सनमुख मिलिया आइ।
धन मैली पिव ऊजला, लागि न सकों पाइ॥
जिसे ढूँढ़ती फिरती थी, वह सामने आ मिला। पर मैं (जीवात्मा) मैली हूँ और प्रियतम उज्ज्वल—इसलिए उसके चरणों में लग भी नहीं पा रही। पात्रता के बिना मिलन अधूरा है।
प्रेम और विरह