मूँड़ मुड़ाये हरि मिले, सब कोई लेय मुड़ाय।
बार-बार के मुड़ते, भेड़ न बैकुंठ जाय॥
यदि सिर मुँड़ाने से भगवान मिलते तो सब मुँड़ा लेते। भेड़ तो बार-बार मुँड़ती है, फिर भी वह बैकुंठ नहीं जाती। बाहरी क्रिया से मुक्ति नहीं मिलती।
पाखंड और आडंबर