जेती देखौ आत्म, तेता सालिगराम।
राधू प्रतषि देव है, नहीं पाथ सूँ काम॥
जितनी आत्माएँ दिखती हैं, उतने ही शालिग्राम हैं। साधु प्रत्यक्ष देवता है—पत्थर की मूर्ति से कोई काम नहीं। जीवित चेतना ही सच्चा देवस्थान है।
पाखंड और आडंबर