जप-तप दीसैं थोथरा, तीरथ व्रत बेसास।
सूवै सैंबल सेविया, यौ जग चल्या निरास॥

अर्थ

जप-तप थोथे दिखाई देते हैं और तीर्थ-व्रत का भरोसा भी व्यर्थ। जैसे तोता सेमल के फल की आस में बैठा रहता है और खाली हाथ लौटता है, वैसे ही यह जग निराश चला जाता है।

पाखंड और आडंबर

पाखंड और आडंबर पर और दोहे

003

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर॥

हाथ में माला फेरते-फेरते युग बीत गया, पर मन की चंचलता और विकार नहीं बदले। कबीर कहते हैं—हाथ की माला छोड़ो और मन के मनके को फेरो; बाहरी दिखावे से नहीं, भीतर के सुधार से भक्ति होती है।

पाखंड और आडंबर
006

कबीरा माला मनहि की, और संसारी भीख।
माला फेरे हरि मिले, गले रहट के देख॥

सच्ची माला तो मन की होती है, बाकी सब सांसारिक दिखावा है। यदि केवल माला फेरने से ही भगवान मिल जाते, तो रहट में गले-गले माला-सी घूमती घड़ियाँ सबसे पहले उन्हें पा लेतीं।

पाखंड और आडंबर
043

कबीरा जपना काठ की, क्या दिखलावे मोय।
हृदय नाम न जपेगा, यह जपनी क्या होय॥

कबीर कहते हैं—काठ की माला दिखाकर मुझे क्या प्रभावित करना चाहते हो? जब हृदय से नाम का जप ही नहीं होगा, तो यह माला किस काम की? आडंबर भक्ति का विकल्प नहीं।

पाखंड और आडंबर
069

ज्यों तिल माहीं तेल है, ज्यों चकमक में आग।
तेरा साईं तुझमें, बस जाग सके तो जाग॥

जैसे तिल में तेल छिपा है और चकमक पत्थर में आग—वैसे ही तेरा स्वामी तेरे ही भीतर बसा है। बस जाग सके तो जाग जा। ईश्वर बाहर नहीं, भीतर है।

पाखंड और आडंबर