कबीर दुनिया देहुरै, सीत नवावन गंग जाइ।
हिरदा भीतर हरि बसै, तू ताहि सौ ल्यो लाइ॥
दुनिया मंदिर-मंदिर सिर नवाती है और गंगा नहाने जाती है। पर हरि तो हृदय के भीतर बसते हैं—तू अपना मन उन्हीं से लगा।
पाखंड और आडंबर