काजी-मुल्ला भ्रमिया, चल्या युनीं कै साथ।
दिल थे दीन बिसारिया, करद लई जब हाथ॥
काजी और मुल्ला भी भ्रम में पड़कर भीड़ के साथ चल दिए। जब हाथ में छुरी उठा ली, तब दिल से धर्म को ही भुला बैठे। हिंसा में धर्म नहीं बचता।
पाखंड और आडंबर