भारी कहों तो बहु डरों, हलका कहूँ तौ झूठ।
मैं का जाणी राम कों, नैनूं कबहूँ न दीठ॥
उसे भारी कहूँ तो डर लगता है और हलका कहूँ तो झूठ होगा। मैं राम को क्या जानूँ, आँखों से कभी देखा ही नहीं। यह ईश्वर के अवर्णनीय होने की विनम्र स्वीकृति है।
भक्ति और नाम-स्मरण