दीठा है तो कस कहूँ, कह्या न को पितयाइ।
हरि जैसा है तैसा रहो, तू हरिष-हरिष गुण गाइ॥
जो देखा है उसे कहूँ कैसे, और कहूँ तो कोई विश्वास नहीं करता। हरि जैसे हैं वैसे ही रहें—तू बस प्रसन्न होकर उनके गुण गाता रह।
भक्ति और नाम-स्मरण