देखा देखी भक्ति का, कबहुँ न चढ़ सी रंग।
बिपति पड़े यों छाड़सी, केचुलि तजत भुजंग॥
देखा-देखी की भक्ति का रंग कभी नहीं चढ़ता। विपत्ति पड़ते ही वह ऐसे छूट जाती है जैसे साँप केंचुल त्याग देता है।
भक्ति और नाम-स्मरण