कबीर केवल राम की, तू जिनि छाँड़ै ओट।
घण-अहरनि बिचि लौह ज्यूँ, घणी सहै सिर चोट॥
केवल राम की ओट कभी मत छोड़ना। जैसे लोहा हथौड़े और निहाई के बीच रहकर चोटें सहता है और आकार पाता है, वैसे ही साधक को भी सहना पड़ता है।
भक्ति और नाम-स्मरण