कबीर हरि का भावता, झीणां पंजर मांस।
रैणि न आवै नींदड़ी, अंगि न चढ़ई मांस॥
हरि का सच्चा प्रेमी दुबला और क्षीण हो जाता है। रात को उसे नींद नहीं आती और शरीर पर मांस नहीं चढ़ता। विरह देह को गला देता है।
भक्ति और नाम-स्मरण