सिर साटैं हरि सेवइये, छाँड़ि जीव की बाणि।
जे सिर दीया हरि मिलै, तब लगि हाणि न जाणि॥
जीवन के मोह की आदत छोड़कर सिर देकर हरि की सेवा करो। यदि सिर देने से हरि मिल जाएँ तो इसे घाटा मत समझो।
भक्ति और नाम-स्मरण