कुलवंता कोटिक मिले, पंडित कोटि पचीस।
सुपच भक्त की पनहि में, तुलै न काहू शीश॥
करोड़ों कुलीन और पच्चीस करोड़ पंडित मिल जाएँ, तो भी उनका सिर एक नीच कुल के भक्त की जूती के बराबर भी नहीं तुलता।
भक्ति और नाम-स्मरण