माला पहरयां कुछ नहीं, भगति न आई हाथ।
माथौ मूँछ मुंडाइ करि, चल्या जगत् के साथ॥
माला पहनने से कुछ नहीं हुआ, भक्ति हाथ नहीं आई। सिर और मूँछ मुँड़ाकर बस भीड़ के साथ चल पड़ा—भेड़चाल से साधना नहीं होती।
भक्ति और नाम-स्मरण