पावक रूपी राम है, घटि-घटि रह्या समाइ।
चित चकमक लागै नहीं, ता थै घूवाँ है-है जाइ॥
राम अग्नि के समान हर हृदय में समाए हैं। पर चित्त की चकमक रगड़ती नहीं, इसलिए ज्वाला नहीं उठती और सब धुआँ बनकर उड़ जाता है।
भक्ति और नाम-स्मरण