चतुराई हरि ना मिलै, ए बातां की बात।
एक निस प्रेही निरधार का, गाहक गोपीनाथ॥
चतुराई से हरि नहीं मिलते, यह तो केवल बातों की बात है। जो निष्कपट प्रेमी और निराधार है, उसके ग्राहक स्वयं गोपीनाथ हैं।
भक्ति और नाम-स्मरण