सुमिरत सुरत जगाय कर, मुख के कछु न बोल।
बाहर का पट बंद कर, अंदर का पट खोल॥
स्मरण करते हुए भीतर की सुरति जगाओ, मुख से कुछ कहने की आवश्यकता नहीं। बाहरी इंद्रियों के द्वार बंद करो और भीतर का द्वार खोलो। भक्ति अंतर्मुखी होकर ही फलती है।
भक्ति और नाम-स्मरण