अपने-अपने साख की, सबही लीनी मान।
हरि की बातें दुरंतरा, पूरी ना कहूँ जान॥
सबने अपनी-अपनी समझ और गवाही को ही सही मान लिया है। किंतु हरि की बातें बहुत गहरी हैं, उन्हें पूरी तरह कोई नहीं जान पाया। मत-मतांतर अधूरे अनुभव से जन्मते हैं।
भक्ति और नाम-स्मरण