भक्ति निसेनी मुक्ति की, संत चढ़े सब आय।
नीचे बाधिनि लकु रही, कुचल पड़े कू खाय॥
भक्ति मुक्ति की सीढ़ी है जिस पर संत चढ़ जाते हैं। पर नीचे माया रूपी बाघिन घात लगाए बैठी है—जो फिसला, उसे वह दबोच लेती है।
भक्ति और नाम-स्मरण