मथुरा भावै द्वारिका, भावे जो जगन्नाथ।
साधु संग हरि भजन बिनु, कछु न आवे हाथ॥
चाहे मथुरा जाओ, चाहे द्वारिका, चाहे जगन्नाथ—साधु की संगति और हरि के भजन के बिना कुछ हाथ नहीं आता। तीर्थाटन भाव का विकल्प नहीं है।
भक्ति और नाम-स्मरण