बोली ठोली मस्खरी, हँसी खेल हराम।
मद माया और इस्तरी, नहिं संतन के काम॥

अर्थ

ठिठोली, उपहास, व्यर्थ की हँसी-खेल, नशा, माया और विषय-आसक्ति—ये संतों के काम की वस्तुएँ नहीं हैं।

माया और मोह

माया और मोह पर और दोहे

017

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर॥

न माया मरी, न मन मरा—शरीर बार-बार जन्मते और मरते रहे। आशा और तृष्णा कभी नहीं मरीं। दास कबीर कहते हैं कि इच्छाओं का अंत ही असली मृत्यु से मुक्ति है।

माया और मोह
027

माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय।
भगता के पीछे लगे, सम्मुख भागे सोय॥

माया और छाया एक जैसी हैं, यह भेद कोई विरला ही समझता है। जो इसके पीछे भागता है उससे यह दूर भागती है, और जो इससे विमुख होकर भक्ति करता है उसके पीछे-पीछे चली आती है।

माया और मोह
114

यह माया है चूहड़ी, और चूहड़ा कीजो।
बाप-पूत उरभाय के, संग ना काहो केहो॥

यह माया नीच वृत्ति वाली है, इसे दूर ही रखो। यह बाप और बेटे तक को आपस में उलझा देती है और किसी का सगा साथ नहीं देती। माया का संग सर्वथा त्याज्य है।

माया और मोह
144

को छूटौ इहिं जाल परि, कत फुरंग अकुलाय।
ज्यों-ज्यों सुरझि भजौ चहै, त्यों-त्यों उरझत जाय॥

इस माया-जाल में फँसकर कौन छूट पाया है? पक्षी व्यर्थ ही छटपटाता है—जितना वह सुलझकर भागना चाहता है, उतना ही अधिक उलझता जाता है।

माया और मोह