तृष्णा सींची ना बुझै, दिन दिन बधती जाइ।
जवासा के रूष ज्यूँ, घण मेहां कुमिलाइ॥
तृष्णा सींचने से बुझती नहीं, दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती है। जैसे जवासे का पौधा वर्षा में और मुरझा जाता है—इच्छाएँ पूरी करने से घटती नहीं।
माया और मोह