भूखा-भूखा क्या करे, क्या सुनावे लोग।
भाँडा घड़ निज मुख दिया, सोई पूर्ण जोग॥

अर्थ

भूखा-भूखा कहकर लोगों को क्या सुनाते फिरते हो? जिसने यह देह रूपी पात्र गढ़ा और मुख दिया, वही भरने का प्रबंध भी करेगा। यही पूर्ण योग है—भरोसा।

दया और परोपकार

दया और परोपकार पर और दोहे

011

जहाँ दया तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप।
जहाँ क्रोध तहाँ पाप है, जहाँ क्षमा तहाँ आप॥

जहाँ दया है वहीं धर्म बसता है और जहाँ लोभ है वहाँ पाप। क्रोध पाप को जन्म देता है, जबकि क्षमा में स्वयं परमात्मा का वास है। मनुष्य के भाव ही उसके धर्म-अधर्म को तय करते हैं।

दया और परोपकार
031

दुर्बल को न सताइए, जाकी मोटी हाय।
बिना जीव की हाय से, लोहा भस्म हो जाय॥

कमजोर को कभी मत सताओ, उसकी आह बहुत भारी होती है। जैसे धौंकनी की निर्जीव फूँक से लोहा तक भस्म हो जाता है, वैसे ही निर्बल की आह विनाश कर देती है।

दया और परोपकार
032

दान दिए धन ना घटे, नदी न घटे नीर।
अपनी आँखों देख लो, यों क्या कहे कबीर॥

दान देने से धन कम नहीं होता, जैसे बहने से नदी का जल नहीं घटता। कबीर कहते हैं—यह बात केवल सुनो मत, अपनी आँखों से परख लो। देने से ही बढ़ोतरी होती है।

दया और परोपकार
081

दाया कौन पर कीजिये, का पर निर्दय होय।
साईं के सब जीव है, कीरी कुंजर दोय॥

किस पर दया करें और किस पर निर्दय हों? चींटी हो या हाथी—सभी जीव उसी एक स्वामी के हैं। इसलिए दया में भेदभाव नहीं, सब पर समान करुणा होनी चाहिए।

दया और परोपकार