सदा कृपालु दुःख परिहरन, बैर भाव नहिं दोय।
छिमा ज्ञान सत भाखही, सिंह रहित तु होय॥
सदा कृपालु रहे, दूसरों के दुःख हरे, किसी से बैर न रखे, क्षमा और ज्ञान की बात कहे और हिंसा से रहित हो—ये संत के लक्षण हैं।
दया और परोपकार