साधुन के सतसंग से, थर-थर काँपे देह।
कबहुँ भाव कुभाव ते, जनि मिटि जाय सनेह॥
साधुओं के सत्संग में जाते हुए देह थर-थर काँपती है—कहीं किसी कुभाव के कारण वह स्नेह मिट न जाए। यह श्रद्धा की सतर्कता है।
सत्संग और संगति