कबिरा संगति साधु की, जो करि जाने कोय।
सकल बिरछ चंदन भये, बाँस न चंदन होय॥
साधु की संगति का मर्म कोई विरला ही जानता है। चंदन के पास सारे वृक्ष चंदन हो गए, पर बाँस अपने अहंकार के कारण चंदन न बन सका।
सत्संग और संगति